समुद्र मंथन की कहानी को लेकर कहा जाता है कि, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन यानी धन, वैभव और ऐश्वर्य से विहीन हो गया था. तब विष्णु जी ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन का उपाय बताया. विष्णु जी ने कहा कि, समुद्र मंथन से जो अमृत कलश प्राप्त होगा, उससे आप सभी अमर हो जाएंगे.।
समुद्र मंथन की कहानी बहुत प्रचलित है. समुद्र मंथन से निकली 14 रत्नों का आज भी काफी महत्व है. लेकिन ये सभी 14 चीजें शुभ नहीं थी, बल्कि समुद्र मंथन से कुछ अशुभ चीजें भी निकली थी जैसे हलाहल विष ,और ।वारुणी ।
धर्म पुराणों में समुद्र मंथन की कथा को विस्तापूर्वर बताया गया है. इसके अनुसार, समुद्र मंथन सावन के महीने में ही किया गया है. समुद्र मंथन की कहानी और समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश के बारे में कई लोग जानते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि, समुद्र मंथन से निकली वो कौन सी चीजें थीं, जिन्हें मानव, देवता और सृष्टि के लिए उपयोनी नहीं माना जाता है.।
समुद्र मंथन की कहानी को लेकर कहा जाता है कि, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन यानी धन, वैभव और ऐश्वर्य से विहीन हो गया था. तब विष्णु जी ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन का उपाय बताया. विष्णु जी ने कहा कि, समुद्र मंथन से जो अमृत कलश प्राप्त होगा, उससे आप सभी अमर हो जाएंगे.। इसके बाद वासुकी नाग की नेती बनाई गई और मंदाचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया. इसके बाद एक-एक कर समुद्र से कुल 14 चीजें निकलीं, जिन्हें 14 बहुमूल्य रत्न कहा जाता है. इन 14 चीजों का बंटवारा देवताओं और असुरों के बीच किया गया. लेकिन अमृत कलश के लिए देवताओं और असुरों के बीच विवाद छिड़ गया था. आइये जानते हैं, समुद्र मंथन से निकली उन चीजों के बारे में जिसे शुभ नहीं माना जाता है।
समुद्र मंथन से निकले 14 बहुमूल्य रत्नों के नाम
हलाहल विष, कामधेनु गाय, उच्चै:श्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रंभा, माता लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, पांचजन्य शंख, पारिजात वृक्ष,शारंग धनुष और अमृत कलश.। ।
समुद्र मंथन से निकली अशुभ चीजें
हलाहल विष: समुद्र मंथन में सबसे पहले हलाहल विष निकला था. इस विष की ज्वाला इतनी तीव्र थी कि सभी देवता और दानव जलने लग गए. तब भगवान शिव देवता, दानव और समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए इसे खुद पी गये. लेकिन विष की तीव्र जलन के कारण शिवजी का कण्ठ नीला पड़ गया और उनके शरीर का ताप बढ़ने लगा. इसीलिए शिवजी का एक नाम नीलकण्ठ भी पड़ा. विष की ज्लावा को कम करने के लिए सभी देवताओं और दानवों ने शिवजी को शीतल जल चढ़ाया. इसके बाद उनके शरीर का ताप और जलन कम हुआ. यही कारण है कि सावन में शिवजी का जलाभिषेक किया गया है. कहा जाता है कि, शिवजी जब हलाहल विष को पी रहे थे तब इसकी कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिर गई, जिसे सांप, बिच्छू और विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया. इस कारण ये जन्तु जहरीले होते हैं.
वारुणी: वारुणी एक खास तरह की शराब या मदिरा है, जिसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई. जल से उत्पन्न होने के कारण इसे वारुणी कहा गया. देवता सुरापान करते थे और दानव मदिरा. इसलिए विष्णुजी के आदेश पर यह दानवों को प्राप्त हुई. इसे लेकर यह भी कहा जाता है कि, कंदब के फलों से बनाई जाने वाली इस मदिरा को वारुणी कहा जाता है. वहीं चरक संहिता में वारुणी को मदिरा एक ऐसा प्रकार बताया गया हैस जिसका औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है.
उल्लेखनीय है कि समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष और वारुणी को अशुभ तो नहीं कहा जा सकता है. लेकिन मानव, देवता और समस्त सृष्टि के लिए इसे उपयोगी नहीं माना गया. इसलिए सृष्टि की रक्षा के लिए शिवजी ने स्वयं हलाहल विष ग्रहण कर लिया तब से भगवन भोले नाथ का नाम नील कंठ महादेव कहलाये और वारुणी यानी मदिरा को भगवान विष्णु ने दानवों को दे दी गई.
वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथा
वामन देव को भगवान विष्णु का पांचवा अवतार कहा जाता है. त्रेतायुग में भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को ऋषि कश्यप और माता अदिति के घर वामन देव का जन्म हुआ था.।
पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को वामन जयंती के मनाई जाती है. धार्मिक मान्यता है कि, इसी दिन त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने वामन अवतार में धरती पर जन्म लिया था. वामन देव का अवतार भगवान विष्णु का पांचवा अवतार माना जाता है. इससे पहले भगवान मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह अवतार में जन्म ले चुके हैं.।
इस तिथि में वामन देव का जन्म होने के कारण इसे वामन जयंती के रूप में मनाया जाता है. इसे वामन द्वादशी भी कहते हैं. इस दिन व्रत रखकर वामन देव की पूजा की जाती है. मान्यता है कि वामन देव की पूजा करने से जीवन के दुख, दर्द और दरिद्रता दूर हो जाते हैं.।
भगवान विष्णु को क्यों लेना पड़ा वामन अवतार
वेद-पुराणों में भगवान विष्णु के 10 अवतारों का वर्णन मिलता है, जिसमें वामन पांचवा अवतार है. जब-जब सृष्टि पर विपत्ति या संकट आती, तब-तब श्रीहरि अवतार में जन्म लेकर इसे दूर करते. भगवान विष्णु का वामन अवतार भी इसी उद्देश्य से हुआ था. भगवान विष्णु के वामन अवतार को लेकर ऐसी मान्यता है कि, इंद्र देव को स्वर्ग का राजपाट लौटाने के लिए और अति बलशाली दैत्यराज बलि के घमंड को तोड़ने के लिए भगवान विष्णु को वामन अवतार लेना पड़ा था. आइये जानते हैं विष्णु जी के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में.
दैत्यराज बलि बहुत बलशाली था और उसने अपने बल से तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया. राजा बलि भले ही क्रूर था और उसे अपनी शक्ति का बहुत घमंड भी था. लेकिन इसी के साथ वह भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त भी था और वह खूब दान-पुण्य करता था. इस कारण इंद्रदेव की जगह उसे स्वर्ग का स्वामी बना दिया गया.।
जब देवी-देवताओं को परेशान करने लगा बलि
लेकिन जैसे ही बलि को स्वर्ग का स्वामी बनाया गया, उसने अपने बल और पद का गलत प्रयोग कर सभी देवी-देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया. बलि के अत्याचार से स्वर्ग के सभी देवी-देवता भी बहुत परेशान हो गए और इसके बाद सभी ने भगवान विष्णु से मदद की गुहार लगाई. इंद्र देव ने भी भगवान से स्वर्ग पर पुन: अधिकार प्राप्त करने की प्रार्थना की. तब भगवान विष्णु ने सभी देवी-देवताओं को यह आश्वसान दिया कि, वह राजा बलि के घमंड को तोड़ेंगे और उसके कब्जे से तीनों लोकों को मुक्त कराएंगे. अपने इसी वचन को निभाने के विष्णु जी ने त्रेतायुग में धरती पर भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को माता अदिति और कश्यप ऋषि के पुत्र के रूप में जन्म लिया. इसे ही भगवान विष्णु का वामन अवतार कहा जाता है.
भगवान विष्णु जी एक बौने या बटुक ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंचे.
विष्णु जी एक बौने या बटुक ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंचे. इस रूप में उनके एक हाथ में छाता और दूसरे में लकड़ी थी. वामन देव ने बलि से तीन पग भूमि दान में देने की विनती की. बलि अपनी वचनबद्धता और दान देने के लिए प्रसिद्ध थे. इसलिए असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि से किसी भी तरह का कोई वचन देने से पहले चेतावनी भी दी, लेकिन इसके बावजूद राजा बलि ने ब्राह्मण पुत्र को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया.
वामन देव ने दो पग में नाप लिया स्वर्ग-पृथ्वी
इसके बाद वामन देव ने विशाल रूप धारण कर लिया और उन्होंने अपने एक पैर से पूरी धरती और दूसरे पैर से पूरे स्वर्ग लोक को नाप लिया. इसके बाद जब तीसरे पैर के लिए कुछ भी नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और वामन देव को अपने सिर पर पैर रखने के लिए कहा. इस तरह से भगवान ने बलि का घमंड तोड़ दिया. लेकिन बलि की वचनबद्धता से वे अति प्रसन्न हुए और इसके बाद उसे पाताल लोक का राजा बना दिया. जैसे ही वामन देव ने राजा बलि के सिर पर अपना पैर रखा, वो तुरंत पाताल लोक पहुंच गए और भगवान विष्णु की कृपा से बलि ने अनंतकाल तक पाताल लोक में राज किया.।
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