लेकिन पहले से मौजूद रामलला की प्रतिमा का क्या होगा? यह सवाल कई लोगों के ज़ेहन में उठ रहा है.
पहले जनसंघ फिर भाजपा और संघ परिवार की ओर से लगातार दावा किया जाता रहा है कि 22-23 दिसंबर 1949 को मूर्ति का 'प्रकट होना' एक दैवीय घटना थी.।
आयोध्या /( सुनील शर्मा) रामलला की मूर्ति को स्वयंभू बताने वाले लोग समय-समय पर श्रीराम लला के प्रकट होने में प्रकरण में कई लोगों के सहयोग की भी सराहना करते रहे हैं.रामलला के प्रकाट्य के प्रसंग में' जनसंघ और आरएसएस के नेता तत्कालीन कलेक्टर केके नायर और गीता प्रेस के संचालक हनुमान प्रसाद पोद्दार की अहम भूमिका की प्रशंसा करते रहे हैं.
पिछले 74 सालों से रामलला के रूप में उसी मूर्ति की पूजा-अर्चना होती रही है.।
आज़ादी से पहले की कहानी
दरअसल, 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद नवाबी शासन समाप्त होने पर ब्रिटिश क़ानून, शासन और न्याय व्यवस्था लागू हुई. माना जाता है कि इसी दरम्यान हिंदुओं ने मस्जिद के बाहरी हिस्से पर क़ब्ज़ा करके चबूतरा बना लिया और भजन-पूजा शुरू कर दी, जिसको लेकर वहाँ झगड़े होते रहते थे.
इसको लेकर दोनों पक्षों के बीच कई बार झगड़े और मुक़दमे भी हुए. यह सिलसिला 90 से भी ज़्यादा सालों तक चला. हिंदू वैरागियों ने 24 नवंबर, 1949 से मस्जिद के सामने क़ब्रिस्तान को साफ़ करके वहाँ यज्ञ और रामायण पाठ शुरू कर दिया जिसमें काफ़ी भीड़ जुटी. झगड़ा बढ़ता देखकर वहाँ एक पुलिस चौकी बनाकर सुरक्षा में अर्धसैनिक बल पीएसी लगा दी गई.
पीएसी तैनात होने के बावजूद 22-23 दिसंबर 1949 की रात महंत अभय रामदास ने घोषणा कर दी कि राम लला मस्जिद के भीतर अवतरित हुए हैं, इसके बाद प्रचार चला कि भगवान राम ने वहाँ प्रकट होकर अपने जन्मस्थान पर वापस क़ब्ज़ा ले लिया है.
बाद में जब अयोध्या में ज़मीन के स्वामित्व का मामला अदालत में पहुँचा तो भगवान रामलला विराजमान मुक़दमे में मुख्य याचिकाकर्ता बने.
रामलला की मूर्ति कैसे सामने आई और उसकी राम मंदिर से जुड़े आंदोलन में क्या भूमिका रही, इस बारे में जानने के लिए हमने साल 1992 से राम जन्मभूमि मंदिर के प्रमुख पुजारी रहे आचार्य सत्येंद्र दास से बात की.
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