बात उस दौर की है जब देश के लोग आजादी की पहली क्रांति (1857 का विद्रोह) को असफल होते देख चुके थे. पर इस असफलता की निराशा के बीच देश में कोई ऐसा था जो रामजन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए मचल रहा था. निहंग सिख फकीर सिंह अपने 25 लड़ाकों के साथ अयोध्या पहुंचते हैं और जन्मभूमि मस्जिद (तब विवादित ढांचे का यही नाम था) में घुसकर वहां कब्जा कर लेते हैं और रामलला की पूजा अर्चना शुरू करवाते हैं. इतना ही नहीं वे करीब 2 महीने परिसर के अंदर ही रहते हैं जब तक कि अंग्रेज प्रशासन उन्हें बाहर करने के लिए बल प्रयोग नहीं करता है.
हालांकि हटने के बाद वो फिर आते हैं और 1860 तक कब्जा बनाए रखते हैं. रामजन्मभूमि का यह सिपाही उस समय अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ पर उसका अदम्य साहस बेकार नहीं गया. करीब 157 साल बाद इस निहंग फकीर की कहानी के दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में रामजन्मभूमि मंदिर के फैसले के लिए साक्ष्य बन जाते हैं.
गुरुद्वारों से हटती हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर और कनाडा-ब्रिटेन-ऑस्ट्रेलिया में हिंदू मंदिरों को क्षतिग्रस्त करते सिख चरमपंथियों की खबरों के बीच आज की युवा पीढ़ी के लिए निहंग सरदार फकीर सिंह की कहानी बेहद प्रेरणादायी हो सकती है.।
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