नेपाल से भेजी गई शिलाओं से मूर्तियां नहीं बनाए जाने के बाद बीबीसी ने नेपाल और भारतीय अधिकारियों से बात करके ये समझने की कोशिश की है कि ये शिलाएं कहां रखी गयी हैं और इनका किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.
ये ख़बर लिखे जाने तक इन शिलाओं की स्थिति के बारे में कोई पुख़्ता जानकारी नहीं मिल सकी है.
लेकिन नेपाल से इन शिलाओं को अयोध्या भेजने का प्रस्ताव लाने वाले पूर्व उप-प्रधानमंत्री और पूर्व गृह मंत्री तथा नेपाली कांग्रेस के नेता बिमलेंद्र निधि ने बताया है कि उन्हें जानकारी मिली है कि पत्थरों को सुरक्षित रखा गया है.
उन्होंने कहा, ''उस शिला से मूर्ति बनाना उपयुक्त नहीं था, इसलिए मुझे जानकारी मिली है कि वह उस स्थान पर सुरक्षित रखा गया है जहां राम मंदिर बनाया जा रहा है.''
"भले ही मूर्ति न बनी हो, लेकिन कहा गया है कि पवित्र शिला को गरिमापूर्ण तरीके से मंदिर परिसर में स्थापित किया जाएगा ताकि लोग इसकी पूजा कर सकें."
अयोध्या से लोगों के लिए शादी के दिन जनकपुर के जानकी मंदिर में आने की प्रथा है.
उसी परंपरा को जारी रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत के अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करने के बाद, नेपाल ने कालीगंडकी का शिलाएं भेजने का प्रस्ताव रखा.
बेनी नगर पालिका जहां से शिलाएं भेजे गए थे, वहां के मेयर सुरत केसी का कहना है कि ये शिलाएं कांग्रेस नेता बिमलेंद्र निधि की पहल पर भेजे गए थे और इन्हें मूर्तियां बनाने के लिए नेपाल से अयोध्या ले जाया गया था.
हालांकि, उन्होंने कहा कि उन्हें यह जानकर दुख हुआ कि मूर्तियां नहीं बनी थीं.
उन्होंने कहा, "मैंने इन शिलाओं को भेजने वालों से कहा है कि अगर इन शिलाओं से मूर्ति नहीं बनी है तो उन्हें वापस लाया जाना चाहिए. इन शिलाओं से मूर्ति बनाए जाने का दबाव होने के बाद भी मूर्ति नहीं बनी.”
"हमारा कहना ये है कि इन शिलाओं को हमने जिस तरह भेजा है, उसके बाद उन्हें सम्मानपूर्वक जगह दी जानी चाहिए.”
शिलाओं को भेजने का फ़ैसला
शिला भेजने वाली गंडकी राज्य सरकार की सामाजिक विकास मंत्री सुशीला सिंखडा से जब इस बारे में पूछा गया कि शुरुआत में मूर्ति बनाने के लिए भेजी गई थी और ताम्रपत्र में भी इसका जिक्र था, लेकिन अयोध्या पहुंचने के बाद मूर्ति नहीं बनी, तो उन्होंने इस पर अनभिज्ञता जताई.
उसने कहा, "मुझे अभी इस बारे में जानकारी नहीं है. मैं आपको बाद में इससे अवगत कराऊंगी.”
बीबीसी ने जनकपुर के जानकी मंदिर के पुजारी रामरोशन दास से भी इस बारे में पूछा.
हालांकि, उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें नेपाल से लिए गए पत्थरों की ताजा स्थिति की जानकारी नहीं है.
उन्होंने कहा, ''मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता.''
शिला का उपयोग कैसे किया जाता है?
नेपाल के कुछ प्रतिनिधियों का कहना है कि इन शिलाओं से भले भी मूर्ति का निर्माण न किया गया हो लेकिन उनकी शालिग्राम के रूप में पूजन किया जाएगा.
इन शिलाओं को भेजने की प्रक्रिया से जुड़े रहे कुलराज चालीसे ने बताया है कि उन्हें पता चला है कि इन शिलाओं को मंदिर परिसर में ही रखा जाएगा.
चालीसे को शालिग्राम का सांस्कृतिक महत्व समझने वाले विद्वानों में गिना जाता है.
उन्होंने कहा है कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने बताया है कि छोटी शिला को शालिग्राम और बड़ी शिला को उसके आधार के रूप में स्थापित किया जाएगा.
हालांकि, बीबीसी उनकी ओर से दी गई जानकारी की ट्रस्ट के पदाधिकारियों से पुष्टि नहीं कर सकी है.
बीबीसी की ओर से ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से संपर्क करने की बार-बार कोशिशें असफल रहीं.
चालीसे के मुताबिक़, वह एक नेपाली भूविज्ञानी के साथ पिछली जून में अयोध्या गए थे जहां उन्होंने इस शिला की स्थिति को देखा था.
उनका कहना है कि जब मूर्तिकारों ने बड़ी शिला पर मूर्ति तराशने की कोशिश की तो पता चला कि वह ज्यादा कठोर नहीं है.
उन्होंने कहा कि ‘वह मानते हैं कि इन शिलाओं को सम्मानजनक ढंग से रखा जाएगा. लेकिन अगर मूर्तियां बनाने के लिए भेजी गई शिलाओं को दूसरे ढंग से इस्तेमाल किया जा रहा है तो सरकार को इसकी जानकारी देनी चाहिए.’
उन्होंने कहा, “इस शिला को जानकी मंदिर प्रबंधन की ओर से अयोध्या स्थित राम मंदिर को गोधुवा उपहार के रूप में दिया गया था जिसमें नेपाली करदाताओं का पैसा ख़र्च हुआ. बेटी को दिया गया दहेज वापस नहीं लिया जा सकता. लेकिन गोधुवा का किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, उसके बारे में मैती पक्ष को अवगत कराना चाहिए.”
हालाँकि चालीसे का कहना है कि यदि मूर्ति बनाई जाती तो ये केवल मूर्ति बनकर रहने से चट्टान की पहचान मिट जाती, लेकिन इसे चट्टान के रूप में रखने से इसका महत्व बढ़ जाता है.उन्होंने कहा, ''उन्होंने कहा है कि देवशिला को उसी सम्मान के साथ रखा जाएगा जैसे उसे लाया गया था.''
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