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प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल न होने से कांग्रेस पर क्या असर?

कांग्रेस ने 22 जनवरी को अयोध्या में होने वाले राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के न्योते को 'ससम्मान' अस्वाकीर कर दिया है.

नई दिल्ली /( सुनील शर्मा) कांग्रेस ने 22 जनवरी को अयोध्या में होने वाले राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के न्योते को 'ससम्मान' अस्वाकीर कर दिया है.

कांग्रेस पार्टी के आला नेताओं को दो सप्ताह पहले कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता मिला था. कांग्रेस ने इस पर काफी सोच विचार के बाद इसे लेकर कहा कि "एक अर्धनिर्मित मंदिर का उद्घाटन केवल चुनावी लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है."

हालांकि बीजेपी ने इसे लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है. बीजेपी कुछ नेताओं ने कहा है कि प्राण प्रतिष्ठा के न्योते को ठुकराना कांग्रेस की सनातन विरोधी मानसिकता को दिखाता है.

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के चुनावी मेनिफेस्टो का हिस्सा रहा है. ऐसे में आगामी लोकसभा चुनावों से पहले इसके उद्घाटन को लेकर विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी इसका चुनावी लाभ ले सकती है.

ऐसे में ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या अगले चुनावों में बीजेपी को इसका फायदा मिल सकता है और क्या कांग्रेस ने इस कार्यक्रम में शामिल न होने का खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है?

कांग्रेस ने क्या कहा?

10 जनवरी को कांग्रेस ने एक बयान जारी कर कहा है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में कांग्रेस चेयरपर्सन सोनिया गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता अधीर रंजन चौधरी शिरकत नहीं करेंगे.

अपने बयान में पार्टी ने कहा कि बीते महीने उन्हें कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता दिया गया था. कार्यक्रम में शामिल होने, न होने को लेकर पार्टी की बैठक भी हुई थी जिसके बाद ये फ़ैसला लिया गया है.

उनके इस फ़ैसले में पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस भी महाराष्ट्र की एनसीपी भी साथ खड़े दिखते हैं.

जहां एनसीपी ने कहा है कि किसी पार्टी का कार्यक्रम में शामिल होना उसका निजी फ़ैसला है वहीं टीएमसी ने कहा कि इस मुद्दे पर "बीजेपी राजनीति कर रही है."

कांग्रेस ने अपने बयान में कहा, "धर्म व्यक्ति का निजी मसला है. लेकिन बीजेपी और आरएसएस लंबे वक्त से इस मुद्दे को राजनीतिक प्रोजेक्ट बनाते रहे हैं. स्पष्ट है कि एक अर्धनिर्मित मंदिर का उद्घाटन केवल चुनावी लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है."

"2019 के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करते हुए लोगों की आस्था के सम्मान में मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और अधीर रंजन चौधरी, भाजपा और आरएसएस के इस आयोजन के निमंत्रण को ससम्मान अस्वीकार करते हैं."
कांग्रेस नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या ने इससे जुड़े एक सवाल पर मीडिया से कहा, "हम राम मंदिर के विरोध में नहीं है. हम हमारे गांवों में बने राम मंदिरों में जाते हैं. उन्होंने राम मंदिर बनाया इसमें कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन वो इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर रहे हैं. हम इस राजनीतिकरण का विरोध करते हैं."

वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, "लोगों को बांटने को सिवा इनके पास कोई काम नहीं है. पहले धर्म के नाम पर हिंदू मुसलमानों को बांटा, अब भगवान राम को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. शंकराचार्य जी और रामानुज संप्रदाय के लोगों में आपस में खाई पैदा कर रहे हैं."

उन्होंने कहा, "कितने लोगों ने निमंत्रण स्वीकार किया है? किसी जानेमाने धार्मिक नेता ने निमंत्रण पत्र स्वीकार नहीं किया है. उन्होंने सवाल खड़े किए हैं."

"धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि जो मंदिर पूरा न बना हो, वहां मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का काम नहीं किया जा सकता, इसे अशुभ माना जाता है. बाबरी मस्जिद ढांचे को गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली शिव सेना ने भी इसमें जाने से इनकार किया है. राम सभी के हैं. मंदिर का काम पूरा होने के बाद हम ज़रूर वहां जाएंगे."
कांग्रेस के कुछ हलकों में दिखी नाराज़गी
लेकिन कांग्रेस पार्टी के इस फ़ैसले से कांग्रेस के कुछ लोग नाराज़ भी हैं.

कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "राम मंदिर और भगवान राम सबके हैं, राम मंदिर को बीजेपी, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल का मान लेना दुर्भाग्य की बात है."

"मुझे पूरा भरोसा है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी या राम विरोधी पार्टी नहीं है. यह कुछ लोग हैं जिन्होंने इस तरह का फै़सला कराने में भूमिका अदा की है. इस फै़सले से मेरा दिल टूट गया है, इस फ़ैसले से करोड़ों कार्यकर्ताओं का भी दिल टूटा है. उन कार्यकर्ताओं का जिनकी आस्था भगवान राम में है."

"कांग्रेस वो पार्टी है जिसके नेता राजीव गांधी ने ही राम मंदिर का शिलान्यास कराया और मंदिर के ताले तुड़वाने का काम किया था. लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के निमंत्रण को स्वीकार न करना बहुत दुखद है."

गुजरात से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन मोडवाडिया ने सोशल मीडिया पर इस फ़ैसल को लेकर अपनी नाराज़गी जताई.

उन्होंने लिखा, "यह देशवासियों की आस्था और विश्वास का विषय है. कांग्रेस नेतृत्व में ऐसा राजनीतिक निर्णय लेने से दूर रहना चाहिए था। 

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