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सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे...', क्या जानते हैं किसने लिखी ये कविता

राम मंदिर आंदोलन के समय हर राम भक्त की जुबान पर एक पंक्ति थी. वो थी 'सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे'. वीर रस की यह पंक्ति राम मंदिर आंदोलन का नारा बनी थी. इसलिए बहुत अहम हो जाता है ये जानना कि इसे किसने लिखा था.
शाहजहांपुर/( सुनील शर्मा) सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे' वीर रस की यह पंक्ति राम मंदिर आंदोलन का नारा बनी थी. अब समय आ गया है तीन दशक पहले ली गई सौगंध के पूरा होने का. 22 जनवरी को नवनिर्मित राम मंदिर में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी. इसलिए बहुत अहम हो जाता है ये जानना कि 'सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे' गीत किसने लिखा था.

शाहजहांपुर की तहसील जलालाबाद के रहने वाले अजय गुप्ता कहते हैं, मेरे पिता कवि विष्णु गुप्त 6 दिसंबर 1992 को जलालाबाद में एक काव्य गोष्ठी में काव्य पाठ कर रहे थे. इस दौरान अचानक से सूचना मिली कि अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा दिया गया है.। 
मुख्य अतिथि एसडीएम तुरंत अपने वाहन की ओर बढ़े. तभी दूसरी ओर मंच से हुंकार हुई 'सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनाएंगे'. उत्साह से भरे वीर रस के कवि विष्णु गुप्त के मुंह से निकली यह पंक्ति श्री राम मंदिर आंदोलन का नारा बन गई'. । 
घर आए रात में ही इस पंक्ति पर गीत लिख दिया'

'हालांकि, इसके बाद वो घर गए और रात में ही इस पंक्ति पर गीत लिख दिया. उन्होंने अपने इस गीत को और श्री राम पर लिखी अन्य रचनाओं को अपनी पुस्तक सौगंध में संकलित किया है. 1994 में मुंबई से आए गीतकार ने इस गीत को लय बध्य तरीके से गाकर ऑडियो कैसेट भी रिलीज की थी'. 

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