रायपुर /( सुनील शर्मा) 2018 में छत्तीसगढ़ में विधानसभा की 90 में से सर्वाधिक 71 सीटों पर कब्ज़ा करने वाली कांग्रेस पार्टी और सरकार के पांच साल बहुत शांति से गुजरे हों ऐसा नहीं है.
मुख्यमंत्री के चार दावेदारों भूपेश बघेल, चरणदास महंत, टीएस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू में से भूपेश बघेल की ताजपोशी ही बड़ी मुश्किल से हो पाई.
इसके बाद ढाई साल का दौर शुरू हुआ और टीएस सिंहदेव को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय भूपेश बघेल ने टीएस सिंहदेव के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया.
कांग्रेस विधायक दिल्ली पार्टी मुख्यालय में भूपश बघेल को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के ख़िलाफ़ धरना-प्रदर्शन करने लगे.
रायपुर में भी यही हाल रहा. टीएस सिंहदेव का चेहरा मुख्यमंत्री बनाने के वायदे, अपनी इच्छा को आधा बताते और आधा छुपाते, टीवी चैनलों तक सिमट कर रह गया.
रायपुर के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ''शुरुआती ढाई साल के बाद नेता, अफ़सर और पत्रकार तय ही नहीं कर पाए कि वे छत्तीसगढ़ में किसके साथ रहें. उन्हें कांग्रेस नेतृत्व पर भरोसा था कि वह देर-सबेर टीएस सिंहदेव को सीएम ज़रूर बनाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भूपेश बघेल ने राज्य में अपने तरीक़े से कांग्रेस पार्टी और सरकार को चलाना शुरू कर दिया. यह सिलसिला चुनाव तक जारी रहा.''
राज्य की ऊर्जा नगर कहे जाने वाले कोरबा के विधायक और राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल अपने इलाक़े में तैनात किए जाने वाले कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों के ख़िलाफ़ लगातार मुखर बने रहे.
इन दिनों ईडी की न्यायिक हिरासत में जेल में बंद आईएएस रानू साहू के ख़िलाफ़ तो तो जय सिंह अग्रवाल ने मोर्चा ही खोल दिया था.
उन्होंने सार्वजनिक तौर पर तब कोरबा की कलेक्टर रानू साहू पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और राज्य सरकार से उन्हें हटाने की मांग की. लेकिन उनकी शिकायत धरी रह गई.
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