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क्या सत्ता विरोधी समीकरण में फंस रहे हैं कांग्रेस उम्मीदद्वार अरुण वोरा?

जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आते जा रहा है, वैसे-वैसे जमीनी समीकरण  राजनिति फ़िज़ा बदलते जा रहे हैं क्या लगातार तीसरी बार चुनाव जीत पाएंगे, अरुण  वोरा? 
दुर्ग। इस बार के विधानसभा चुनाव में दुर्ग शहरी सीट के प्रत्याशी अरुण बोरा  की राह आसान नहीं हैं।सत्ता विरोधी समीकरण में  और भी उलझते दिखाई दे रहे हैं। पूर्व में अरुण वोरा  की राह आसान मानी जा रही थी । लेकिन जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आते जा रहा है, वैसे-वैसे जमीनी समीकरण  राजनिति फ़िज़ा बदलते जा रहे हैं। मतदाताओं से चर्चा करने पर वे कहते हैं कि दुर्ग शहरी सीट पर परिवर्तन की हल्की लहर है। लोग एक ही परिवार के राजनीतिक विरासत से ऊंब रहे हैं। खास तौर पर नई पीढ़ी चाहती है कि नए लोगों को भी अवसर मिले। अनेक  महिलाओं ने तो यह भी कहाँ कि 30 साल होंगे , का हर बार का एक ही आदमी ला  ही वोट देबो.। 15 साल से विधायक रहीस तबोले शहर में सड़क गड्डा विकास के कोई कार्य नहीं होय। ये बख्त  शहर में ही नहीं पुरा प्रदेश में परिवर्तन की लहर हैं।  जीवन एक बार ही आदमी गड्डा में गिरते बार बार नहीं। 
यहां बात सिर्फ परिवारवाद की नहीं, बल्कि नए बदलते लोकतांत्रिक मूल्यों की भी है । उसके आगे जाकर देखें तो कांग्रेस के ऐसे कार्यकर्ता जो कई दशकों से पार्टी के बड़े सिपहसालार हुआ करते थे, वे भी आज कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में हवा बनाने से बच रहे हैं। अंदरूनी तौर पर कहना गलत न होगा कि वे ही लोग अरुण बोरा के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। यह पहला चुनाव होगा जब अरुण बोरा अपने पिता कांग्रेस के धुरंधर नेता स्व मोतीलाल बोरा के बिना लड़ रहे हैं । स्व. मोतीलाल बोरा के रहते कांग्रेस के सारे कार्यकर्ता व पदाधिकारी शांति से अरुण बोरा के पक्ष में काम करने लग जाते थे । मगर इस बार पिता की छत्रछाया ना होना अरुण बोरा के लिए खतरे की घंटी बजा रही है। 
पिछले चुनाव में भाजपा से चंद्रीका चंद्राकर प्रत्याशी थी। तब मध्ययनी परिवार ने चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया था। उसके पहले के चुनाव में भी राजेंद्र साहू स्वाभिमान मंच से चुनाव लड़कर मुकाबला त्रिकोणीय बना चुके थे । पिछले दो चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले के चलते अरुण वोरा की जीत आसान हुई । मगर इस बार मुकाबला सीधा है। 
 सीधे मुकाबले में मतों का ध्रुवीकरण इस तरह होने जा रहा है कि कांग्रेस प्रत्याशी अरुण बोरा नुकसान की स्थिति में दिख रहे हैं । हालांकि यह कोई फाइनल समीकरण नहीं है । चुनाव आते-आते समीकरण बनते बिगड़ते रहेंगे।
 अंतर्दलीय संरचना भी बदलेगी । मतदाताओं का मन स्पष्ट होगा, और उस समय चुनाव के लिए मतदाता क्या मन बनाती है, यह देखने वाली बात होगी।
 मगर अभी असंतुष्टों को मनाना और कार्यकर्ताओं को अपने पक्ष में सक्रिय करना और उनकी बड़ी जरूरत है। 
अरुण वोरा पिछले 10 सालों से विधायक हैं । पिछले 2013 के सत्र में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार नहीं थी मगर अभी 5 सालों से छत्तीसगढ़ राज्य में भूपेश बघेल की लोकप्रिय सरकार है और अरुण बोरा को कैबिनेट मंत्री का दर्जा है। नगर निगम में भी उनके करीबी धीरज बाकलीवाल महापौर है । ऐसे अनुकूल हालातो में अरुण बोरा की उपलब्धियो पर जनता की पैनी निगाह है। बहुत लोग सोचते है कि विकास कार्यों में शहर पीछे रह गया, और उसके जिम्मेदार शहर के विधायक है । मगर ऐसे भी लोगों की संख्या कम नहीं जो शहर में हुए इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अरुण वोरा को श्रेय देते हैं। सन् 1993 से 2023 तक एक ही आदमी चुनाव लड़ रहा हैं।  पार्टी ने उन्हे सातवी बार टिकट दिया हैं। 1993 में 5 साल तक विधायक रहे। इसके बाद  इसी शहर की जनता ने लगातार 3 चुनाव 1998,2003,2008 लगातार तीन बार  पराजित हुए। इसके बाद 2013,2018 से अब तक  लगातार 10 साल तक  विधायक रहे। 17 नवम्बर को  शहर के मतदाताओं उनका भाग्य का  फेसला मत पेटी में  बंद हो जाएगा  3 दिसम्बर मतगणना के दिन  में स्पष्ट हो  जाएगा कि शहर का विधायक कौन होगा। 

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