Bamleshwari Mandir Dongargadh: बम्लेश्वरी माता के अलावा यहां बजरंगबली मंदिर, नाग वासुकी मंदिर, शीतला और दादी मां जैसे और भी मंदिर स्थित है। मां बमलेश्वरी के आशीर्वाद से भक्तों को शत्रुओं को परास्त करने की शक्ति और विजय का वरदान मिलता है। मां के दरबार में पहुंचकर भक्तों को हर मुश्किलों से लड़ने की रास्ता दिखाई देता है।
( सुनील शर्मा) ✍
माँ के मंदिर जाने के लिए हैं, 1100 सीढ़ियां......
मां बम्लेश्वरी का दरबार 1600 मीटर ऊंची पहाड़ी पर है। श्रद्धालुओं को यहां तक पहुंचने के लिए 1100 सीढ़ियां चढ़नी पड़ेगी। हालांकि यहां रोपवे की भी व्यवस्था है। इसके अलावा आनलाइन दर्शन की भी सुविधा उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की गई है। पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी का मुख्य मंदिर है। उन्हें बड़ी बम्लेश्वरी के रूप में जाना जाता है। पहाड़ के नीचे भी मां बम्लेश्वरी का एक मंदिर है। यह छोटी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि वे मां बम्लेश्वरी की छोटी बहन हैं।
2200 साल पुराना है माँ के मन्दिर का इतिहास......
मां बम्लेश्वरी शक्तिपीठ का इतिहास करीब 2200 साल पुराना है। पहले डोंगरगढ़ कामाख्या नगरी कहलाती थी। कालांतर में डोंगरी और फिर डोंगरगढ़ कहलाने लगी। डोंगरगढ़ का इतिहास मध्य प्रदेश के उज्जैन से जुड़ा है। इसे वैभवशाली कामाख्या नगरी के रूप में जाना जाता था। मां बम्लेश्वरी को मध्य प्रदेश के उज्जयनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी भी कहा जाता है। इतिहासकारों ने इस क्षेत्र को कल्चुरि काल का पाया है। मंदिर की अधिष्ठात्री देवी मां बगलामुखी हैं। उन्हें मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। उन्हें यहां मां बम्लेश्वरी के रूप में पूजा जाता है। यहां की मूर्तिकला पर गोंड़ संस्कृति का पर्याप्त प्रभाव दिखता है। गोंड़ राजाओं के किले के प्रमाण भी यहां मिलते हैं।
राजा वीरसेन ने की मंदिर की स्थापना......
किवदंती है कि करीब 2200 साल पहले यहां राजा वीरसेन का शासन था। वह प्रजापालक राजा थे, सभी उनका बहुत सम्मान करते थे। लेकिन एक दु:ख था उन्हें कि उनके कोई संतान नहीं थी। पंडितों के बताए अनुसार उन्होंने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए शिवजी और मां दुर्गा की उपासना की। साथ ही अपने नगर में मां बम्लेश्वरी के मंदिर की स्थापना करवाई। इसके बाद उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। उनके पुत्र हुए कामसेन जो कि राजा की ही तरह प्रजा के प्रिय राजा बने।
3 किलो सोने से सजा हैं माँ का दरबार......
इसी साल मार्च महीने में ऊपर पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर गर्भगृह को स्वर्ण पत्तल से सुसज्जित किया गया है। जयपुर से आये 20 कारीगरों ने 16 दिनों में इस काम को पूरा किया। जिसमें करीब 3 किलो सोना लगा है। साथ ही आकृति को उभार देने के कार्य एम्बुजिंग वर्क हेतु इम्पोर्टेंट सेरेमिक कोटेड पेंट का उपयोग किया गया है। कलाकृतियों के निर्माण हेतु राजस्थानी कला का उपयोग किया गया है। जिसके बाद माता रानी का दरबार और गर्भगृह दिव्य दिखाई देता है।
बहुत कुछ है देखने लायक......
मां बम्लेश्वरी के दरबार पहुंचने वालों को यहां और भी बहुत कुछ देखने को मिलता है। पर्यटन के लिहाज से पहाड़ी के नीचे छीरपानी जलाशय है। जहां बोटिंग होती है। भक्तों की सुविधा के लिए रोपवे भी है। डोंगरगढ़ की पहाड़ी से लगी दूसरी पहाड़ी में जैन धार्मिक स्थल चंद्रगिरि और प्रज्ञागिरि है। यहां अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन भी होता है।
ऐसे पहुंचें डोंगरगढ़.........
राजधानी रायपुर से रेल मार्ग में 105 किलोमीटर दूर है डोंगरगढ़। जिला मुख्यालय राजनांदगांव से सड़क मार्ग से डोंगरगढ़ की दूरी 35 किलोमीटर है। यहां रेल और सड़क दोनों मार्गों से आसानी से पहुंचा जा सकता है। हावड़ा-मुंबई रेलमार्ग से भी जुड़े डोंगरगढ़ में हर साल चैत्र और क्वांर नवरात्रि पर सभी प्रमुख ट्रेनों को यहां स्टापेज दी जाती है। सड़क मार्ग से रायपुर से दुर्ग 40 किलो मीटर दुर्ग से राजनान्दगाँव 28 किलो मीटर राजनान्दगाँव से 42 किलो मीटर में माँ का मन्दिर स्तिथ हैं। ऐसी मान्यता हैं कि यहाँ दर्शन के लिए आने वाले माँ के भक्तो की हर मनोकामनाये पूर्ण होती हैं। इसलिए राजनेता, क्या आम आदमी (महिला एव पुरुष) भी मां बमलेश्वरी के लिए दर्शन के लिए लाखों की संख्या में दोनों नवरात्रि पर्व में आते हैं। दोनो नवरात्रि के पर्व में मन्दिर रात भर खुला रहता हैं। लोगों की आस्था को मद्देनजर रखते हुए चिकित्सक एव पुलिस बल की भी विशेष वयवस्था की जाती हैं ।
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