इस अवसर पर डॉ.संजय शाक्य ने प्रशिक्षणार्थियों को बताया कि विशुद्ध गोबर से निर्मित भगवान श्री गणेश की मूर्ति बनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण की सुरक्षा है एवं इसे स्वरोजगार के रूप में भी अपनाया जा सकता है। इस मूर्ति में किसी भी प्रकार के सिंथेटिक रंगों का प्रयोग नहीं किया गया हैं। प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों में रासायनिक रंगों का उपयोग किया जाता है विसर्जन उपरांत सभी रासायनिक रंग पानी में घुल जाते है, जिससे अनेक प्रकार की बीमारी हो सकती है। ऐसे जल का उपयोग खेतों में सिंचाई के लिए करने पर फसल को भी काफी नुकसान होता है। गोबर से बने मूर्ति से प्रदूषण नहीं फैलता एवं तत्काल मिट्टी में मिल जाने के कारण यह खाद का भी काम करता है। प्रशिक्षणार्थियों को पंचगव्य संस्थान के निदेशक एवं विश्वविद्यालय जनसंपर्क अधिकारी डॉ. दिलीप चौधरी द्वारा प्रमाण पत्र वितरण पश्चात रमेश कुमार मरावी द्वारा धन्यवाद ज्ञापित कर कार्यक्रम का समापन किया गया
0 Comments